झारखंड की सियासत एक बार फिर केंद्र और राज्य के बीच बड़े संवैधानिक टकराव के मुहाने पर आती दिख रही है। खनिज वाली जमीन पर राज्य सरकार के सेस वसूलने के अधिकार को सीमित करने वाले एमएमडीआर कानून के खिलाफ हेमंत सोरेन सरकार का रुख आक्रामक है। इसी कड़ी में सरकार ने आगामी 25 और 26 नवंबर को विधानसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाया है, जहां इस पर आगे की रणनीति तय होगी। विवाद की शुरूआत केंद्र सरकार की ओर से लाए गए एमएमडीआर (खान एवं खनिज विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 की नई धारा 9डी है। यह प्रावधान कहता है कि राज्य सरकारें अब अपनी मर्जी से खनिजयुक्त भूमि पर कोई सेस नहीं लगा सकतीं। इस कानून के तहत 22 अगस्त 2026 से पहले की वसूली गई पुरानी बकाया राशि को भी अमान्य कर दिया गया है, जिसे झारखंड सरकार ने राज्य के राजस्व के लिए बड़ा झटका बताया है। इस पूरे घमासान के बीच हेमंत सरकार की रणनीति दो मोर्चों पर एकसाथ काम कर रही है। 27 अक्टूबर को हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने एक तरफ विशेष सत्र बुलाकर केंद्र के कानून के खिलाफ राजनीतिक और विधाई प्रस्ताव लाने का निर्णय लिया। वहीं दूसरी तरफ, प्रशासनिक और कानूनी मुस्तैदी दिखाते हुए झारखंड खनिजयुक्त भूमि उपकर अधिनियम, 2024 की अनुसूची में संशोधन को भी मंजूरी दे दी। यह कदम बताता है कि सरकार एक तरफ सड़क से सदन तक राजनीतिक संघर्ष छेड़ेगी, तो दूसरी तरफ सेस वसूली का कानूनी रास्ता भी तलाशेगी। इस सियासी उबाल के पीछे राज्य के बजट का सीधा गणित भी है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के कुल राजस्व अनुमान (1,36,210 करोड़ रुपये) में अकेले खनिजयुक्त भूमि सेस से 14,656 करोड़ रुपये यानी करीब 10.76 फीसदी हिस्सा जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। राज्य सरकार का आकलन है कि इस केंद्रीय संशोधन से उसे सालाना करीब 14,000 करोड़ रुपये का चूना लगेगा।
हालांकि आईआईएम रांची के विशेषज्ञ अमरेंदु नंदी का अनुमान है कि इसका वास्तविक वार्षिक असर 6,500 से 8,500 करोड़ रुपये के बीच हो सकता है। इससे पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सितंबर में ही एमएमडीआर कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी थी।

इंडिया गठबंधन की एकजुटता और भाजपा का पलटवार
आगामी विशेष सत्र के जरिए हेमंत सरकार की कोशिश राज्य के सभी घटक दलों झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दलों को एक साझा मंच पर लाकर केंद्र के खिलाफ संयुक्त प्रस्ताव पास कराने की है। सत्तापक्ष इसे आदिवासियों-मूलवासियों के हक और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता (फेडरलिज्म) पर सीधा हमला बता रहा है। दूसरी ओर, भाजपा ने इस विरोध को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित करार दिया है। प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास का तर्क है कि इस संशोधन से राज्य का पूरा राजस्व खत्म नहीं होने वाला है, बल्कि यह देश भर में खनन क्षेत्र में एकरूपता और निवेश को बढ़ावा देने के लिए है। वहीं केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने भी इसे अर्थव्यवस्था के हित में बताया है।