रांची: झारखंड की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को उजागर करते हुए पूर्व शिक्षा मंत्री श्री बंधु तिर्की ने कहा कि राज्य की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं और खनिज संपदा तक सीमित नहीं है। उन्होंने बताया कि झारखंड की समृद्ध जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएँ, संस्कृति, परंपराएँ और सामाजिक विरासत इसकी आत्मा हैं।
भाषा और संस्कृति का महत्व
श्री तिर्की ने कहा कि किसी भी समाज की भाषा उसके पूर्वजों के ज्ञान और संस्कृति का संवाहक होती है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इतिहास और जीवन दर्शन को पहुंचाने का माध्यम है। उन्होंने चेतावनी दी कि झारखंड की भाषाओं की उपेक्षा वास्तव में इसकी सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करती है।
झारखंड की भाषाई विविधता
उन्होंने बताया कि झारखंड में संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख, खड़िया, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली और पंचपरगनिया जैसी अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। इन भाषाओं में लोकगीत, लोककथाएं, कहावतें, पारंपरिक ज्ञान और साहित्य का विशाल संग्रह है।
संवर्धन की आवश्यकता
हालांकि, उन्होंने निराशा व्यक्त की कि इतनी समृद्ध भाषाई विरासत के बावजूद इन भाषाओं के विकास और शैक्षणिक विस्तार के लिए आवश्यक संस्थागत व्यवस्था नहीं बन पाई है। इस दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखा जा सके।
