दामिन-ए-कोह क्षेत्र की अब वन भूमि पर खनन और क्रशर की अनुमति नहीं

डीएफओ ने 12 आवेदनों को किया रद्द, अवैध खनन के खिलाफ जारी रहेगा अभियान

दुमका। संथाल परगना की वन भूमि पर अब नई खदान और क्रशर नहीं खुलेंगे। और न ही विस्तार की अनुमति दी जायेगी। दुमका वन प्रमंडल पदाधिकारी (डीएफओ) ने इस पर रोक लगा दी है। उन्होंने 12 आवेदनों को रद्द भी कर दिया है। सूत्रों के अनुसार संथाल में सैकड़ों वैध और अवैध खदानें और क्रशर चल रहे हैं। डीएफओ अभिरूप सिन्हा ने 1894 वन अधिनियम का हवाला देते हुए संथाल के दामिन-ए-कोह क्षेत्र के नोटिफाइड फॉरेस्ट भूमि पर खदान व क्रशर का एनओसी देने से इनकार कर दिया है। काठीकुंड और गोपीकंदर प्रखंड क्षेत्र में क्रशर और खदान खोलने के लिए संचालकों ने आवेदन दिया है। इस पर डीएफओ ने 1894 में निर्गत अधिसूचना के तहत आपत्ति दर्ज की है। प्रावधान के तहत इलाके में क्रशर या खदान स्थापित करने से पहले वन विभाग से एनओसी ली जाती है। वन विभाग अपनी जमीन से 250 मीटर दूर क्रशर या खदान संचालन की अनुमति देता है। एक साल पहले तक दुमका के काठीकुंड व गोपीकांदर प्रखंड में वन विभाग की ओर से धड़ाधड़ अनुमति दी जा रही थी। पर, डीएफओ ने एनओसी देने से मना कर दिया है। डीएफओ का तर्क है कि अंग्रेजों के समय में बने अधिनियम 1894 फॉरेस्ट एक्ट के अनुसार संथाल परगना के दुमका, साहिबगंज, पाकुड़, गोड्डा और बिहार के भागलपुर को मिलाकर सीमांकन किया गया था। इसे दामिन-ए-कोह कहा गया। 1894 में बने एक्ट के तहत दामिन-ए-कोह क्षेत्र अंतर्गत गैरमजरूआ (वेस्ट लैंड) जमीन अधिसूचित वन भूमि है। इस एक्ट के तहत संथाल परगना की जमीन दामिन-ए-कोह से संरक्षित होने के कारण यह अधिनियम प्रभावी है। दामिन-ए-कोह क्षेत्र की जमीन को नोटिफाइड फॉरेस्ट मानते हुए क्रशर व खदान चलाने के लिए एनओसी नहीं दिया जा सकता है।

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