जामताड़ा में सर्पदंश की बढ़ती घटनाएँ
झारखंड का जामताड़ा जिला इस समय एक गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। यहाँ के लोग सांप के काटने पर अस्पताल जाने के बजाय तांत्रिकों और झाड़-फूंक पर अधिक विश्वास कर रहे हैं। मानसून के आगमन के साथ ही सर्पदंश के मामलों में तेजी आई है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से जून 2026 के बीच 101 लोग सांप के काटने का शिकार बने हैं, जिनमें से एक महिला की मृत्यु हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जा रहे जागरूकता अभियानों के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास की जड़ें मजबूत बनी हुई हैं।
तांत्रिकों के दावों की सच्चाई
जमीनी स्थिति को समझने के लिए ‘द फॉलो अप’ की टीम ने एक स्थानीय तांत्रिक से बातचीत की। तांत्रिक ने दावा किया कि उसने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 12 से 15 लोगों की जान बचाई है और वह उन मंत्रों का भी जिक्र किया जिनका उपयोग वह सर्पदंश के मरीजों पर करता है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञ इन दावों का पूरी तरह से खंडन करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि तांत्रिक ने यह भी माना कि हाल के महीनों में लोग अस्पताल जाने लगे हैं।
जामताड़ा का नाम और सांपों की प्रजातियाँ
जामताड़ा का नाम संताली भाषा में ‘जामा’ (सांप) और ‘ताड़’ (घर) से लिया गया है, जो इस क्षेत्र में सांपों की प्रचुरता को दर्शाता है। यहाँ मुख्यतः दो अत्यधिक जहरीली प्रजातियाँ पाई जाती हैं। करेत सांप, जो केवल 2 फीट लंबा होता है, रात में सोते हुए लोगों को काटता है। इसका जहर धीरे-धीरे चढ़ता है, जिससे पीड़ित को पता नहीं चलता कि वह काटा गया है। दूसरी प्रजाति, Russell’s Viper, का काटना तुरंत जानलेवा हो सकता है यदि समय पर इलाज न किया जाए।
2026 में सर्पदंश के मामलों में वृद्धि
साल 2026 में जामताड़ा में सर्पदंश की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में 1 मामला, फरवरी में 4, मार्च में 9, अप्रैल में 7, मई में 29, और जून में 51 मामले दर्ज किए गए हैं। जून में एक महिला की मौत भी हुई, जिसकी वजह अस्पताल न जाकर झाड़-फूंक के उपाय करना बताया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये आंकड़े केवल सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित हैं और वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामले बिना रिपोर्ट के रह जाते हैं।
अंधविश्वास और झाड़-फूंक की वास्तविकता
झारखंड में सर्पदंश के मामलों में अंधविश्वास और तांत्रिकों के पास जाने की परंपरा कोई नई नहीं है। सरकारी जागरूकता अभियानों के बावजूद, लोग अस्पताल जाने की बजाय तांत्रिकों का सहारा लेते हैं। हाल ही में हजारीबाग में एक मामला सामने आया था, जहाँ एक बच्चे की जान जाने के बाद उसके शव को गोबर में रख दिया गया, यह उम्मीद करते हुए कि उसकी जान लौट आएगी। ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी बनती है कि लोगों को अस्पताल जाने की सलाह दी जाए।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह
जामताड़ा के सिविल सर्जन डॉ. शिवप्रसाद मिश्र ने बताया कि बारिश के दौरान सांप शिकार के लिए बाहर निकलते हैं। उन्होंने पुष्टि की कि इस वर्ष हुई महिला की मृत्यु झाड़-फूंक के उपायों के चलते हुई। सरकारी अस्पतालों में एंटी-स्नेक वेनम दवा उपलब्ध है। स्नेक बाइट के नोडल ऑफिसर डॉ. अजीत कुमार दुबे ने कहा कि लोग झाड़-फूंक में समय बर्बाद करते हैं। यदि जहरीले सांप के काटने के 2 घंटे के भीतर मरीज अस्पताल पहुंच जाए, तो उसकी जान बचाई जा सकती है। उन्होंने सलाह दी कि सांप काटने पर घबराने के बजाय सीधे नजदीकी सरकारी अस्पताल जाना चाहिए।
