पश्चिम बंगाल में सियासी संघर्ष की नई परतें
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति अब अस्मिता और अस्तित्व की जंग बन चुकी है। हुगली की लहरों के ऊपर भले ही चुनावी प्रचार और आरोप-प्रत्यारोपों की गूंज हो, लेकिन इस राजनीतिक हलचल के पीछे हिंदुत्व का एक गहरा प्रवाह मौजूद है। इसे समझना उतना ही कठिन है, जितना गंगासागर के किनारे भागीरथी के अदृश्य प्रवाह को पहचानना। यह स्थिति ममता बनर्जी के मजबूत गढ़ में दरार डालने की क्षमता रखती है। चुनाव अब पारंपरिक समीकरणों से बाहर निकलकर शक्ति और श्रीराम के संघर्ष में तब्दील हो चुका है, जहाँ हर बयान एक तीर और हर रैली एक घेराबंदी बन गई है।
मोदी की सांस्कृतिक उपस्थिति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बंगाल के मंदिरों में जाना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का प्रयास है, जो बंगाल में लंबे समय से हाशिए पर रही है। दक्षिणेश्वर से बेलूर मठ और मतुआ धाम से कालीघाट तक मोदी की मौजूदगी ने ऐसा विमर्श उत्पन्न किया है, जिसने ममता को उनके ही गढ़ में वैचारिक अस्थिरता का अनुभव कराया है। बंगाल की गलियों में अब नया स्वर गूंज रहा है। पारंपरिक जय महाकाली के साथ **जय श्रीराम** का नारा अब केवल एक नारा नहीं रह गया, बल्कि यह एक राजनीतिक पहचान बन चुका है। कोलकाता की सड़कों पर उमड़ता यह जनसैलाब भाजपा के लिए एक मनोवैज्ञानिक बदलाव का संकेत मान रहा है।
शाह और बंसल की रणनीति
शाह का कमांड, बंसल का बूथ-तंत्र
गृह मंत्री अमित शाह का पिछले कुछ दिनों से कोलकाता में सक्रिय रहना और उन क्षेत्रों में मेहनत करना, जहाँ भाजपा का झंडा पहले कभी नहीं लहराया, यह दर्शाता है कि उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। शाह ने खुद मोर्चा संभाल लिया है, जबकि भाजपा महासचिव सुनील बंसल बूथ स्तर पर संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। बंसल ने उत्तर प्रदेश में बूथ स्तर पर जीत की रणनीति बनाई थी और अब वह बंगाल में भी इसे लागू करने में जुटे हैं। शाह मंच से कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हैं, जबकि बंसल पर्दे के पीछे बूथों का गणित तैयार कर रहे हैं।
भय का सुरक्षा कवच
142 सीटों पर चुनावी मुकाबला तृणमूल का हृदय-प्रदेश माना जाता है। पिछले चुनाव में भाजपा को यहां केवल 18 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार स्थिति भिन्न हो सकती है। भ्रष्टाचार और स्थानीय उत्पीड़न के बीच शाह का यह आश्वासन कि नतीजे आने के बाद भी सुरक्षा बल 60 दिनों तक यहीं रहेंगे, मतदाताओं और कार्यकर्ताओं के लिए एक अभयदान का संदेश है। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, और यह उन समर्थकों के लिए संजीवनी साबित हो सकता है।
ममता की रणनीति और अभिषेक का नेतृत्व
ममता की शक्ति और अभिषेक
ममता बनर्जी ने भाजपा के आक्रामक प्रचार का जवाब देने के लिए बंगाली अस्मिता और धार्मिक समावेश को अपनी रणनीति का मुख्य आधार बना लिया है। जहाँ भाजपा हिंदुत्व को चुनावी मुद्दा बना रही है, वहीं ममता इसे शक्ति उपासना के जरिए अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास कर रही हैं। शीतला मंदिर और कालीघाट जाकर वह यह संदेश दे रही हैं कि बंगाल की परंपरा को बाहरी नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इस संदर्भ में अभिषेक बनर्जी की युवा टीम और भी आक्रामक और रणनीतिक नजर आ रही है।
अभिषेक ने फुटबॉल की उपमा का प्रयोग करते हुए भाजपा को रेड कार्ड दिखाने का आह्वान किया है, जिससे वह युवाओं को अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रहे हैं। तृणमूल के युवा नेता केंद्र की दिल्ली बनाम बंगाल की छवि को भुनाने में सक्रिय हैं। इस तरह, तृणमूल के नेताओं की कोशिश है कि चुनावी विमर्श को मंदिरों से हटाकर केंद्र की अनुदान और अधिकारों की लड़ाई पर केंद्रित किया जा सके। इस प्रकार, बंगाल में प्रतीकों की लड़ाई अब अधिकारों के संघर्ष में बदल चुकी है।
