दिल्ली नगर निगम के 12 वार्डों में उपचुनाव: त्रिकोणीय लड़ाई

नई दिल्ली: दिल्ली के नगर निगम के 12 वार्ड क्षेत्रों में उपचुनाव हो रहे हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के बीच टकराव हो रहा है। 27 साल बाद सत्ता में लौटी भाजपा ने इस उपचुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकी है, और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता खुद प्रचार में जुटी हुई हैं।

आप के नेतृत्व का ध्यान केंद्रित

वहीं, आम आदमी पार्टी के बड़े नेता इस उपचुनाव से दूरी बनाए हुए हैं। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, आतिशी, संजय सिंह और राघव चड्ढा अभी तक चुनावी प्रचार में नजर नहीं आए हैं। प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और उनकी टीम चुनाव का मोर्चा संभाल रही है, परंतु शीर्ष नेतृत्व की गैर-मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

वार्डों की स्थिति

उपचुनाव होने वाले 12 वार्डों में से 9 सीटें भाजपा के पास थीं, जबकि 3 सीटें आम आदमी पार्टी ने 2022 के MCD चुनाव में जीती थीं। ये सीटें अब खाली हो गई हैं क्योंकि तीन पार्षद 2025 के विधानसभा चुनाव में विधायक बन चुके हैं।

प्रचार का स्वरूप

चांदनी महल, चांदनी चौक, और दिचाऊं कलां जैसे वार्डों में प्रचार का दायरा स्थानीय नेताओं के पास है, जबकि पार्टी के बड़े नेता मैदान में नहीं हैं। उपचुनाव को लेकर आप की रणनीति पर पत्रकार नवनीत शरण का कहना है कि शीर्ष नेतृत्व के इस दूरी बनाए रखने से पार्टी को नुकसान हो सकता है।

बड़े नेताओं की अनुपस्थिति

अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे नेता चुनाव प्रचार में न भाग लेकर पंजाब पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। जबकि संजय सिंह उत्तर प्रदेश में ‘रोजगार दो, सामाजिक न्याय दो’ यात्रा निकाल रहे हैं।

सामाजिक मीडिया पर सक्रियता का अभाव

दिल्ली में हो रहे उपचुनाव के संबंध में शीर्ष नेताओं की सोशल मीडिया पर भी कोई सक्रियता नहीं दिखाई दे रही है। पार्टी के अन्य नेता स्थानीय स्तर पर प्रचार कर रहे हैं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व का समर्थन न होना आश्चर्यजनक है।

भविष्य की चुनौती

दिल्ली की राजनीति पर नज़र रखने वाले पत्रकार आनंद राणा के अनुसार, 27 साल बाद आई भाजपा सरकार की परीक्षा है। अगर आम आदमी पार्टी उपचुनाव न जीत पाई, तो इसका सीधा असर केजरीवाल की राजनीति पर पड़ेगा।

केजरीवाल की पंजाब पर ध्यान

अंततः यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक महत्व के इस उपचुनाव में भाजपा और आप दोनों के लिए मौका और चुनौती है। जबकि पार्टी नेतृत्व का ध्यान पंजाब पर केंद्रित है, दिल्ली में उपचुनाव के नतीजे उनके राजनीतिक भविष्य को तय कर सकते हैं।