रांची में परिसीमन पर सेमिनार का आयोजन

रविवार को रांची प्रेस क्लब सभागार में “परिसीमन का आदिवासी समाज पर प्रभाव एवं संभावित समाधान” विषय पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया। यह सेमिनार आगामी 2026 के लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज के बीच बढ़ती चिंताओं के संदर्भ में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और परिसीमन के संभावित प्रभावों पर चर्चा की।

मुख्य वक्ता की टिप्पणियाँ

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, जो झारखंड सरकार की समन्वय समिति के सदस्य भी हैं, ने कहा कि झारखंड में लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का आदिवासी समाज पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ने दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि परिसीमन के जरिए अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या में कमी लाने का प्रयास किया गया, तो इसका लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से विरोध किया जाएगा।

संविधान की रक्षा की आवश्यकता

तिर्की ने यह भी बताया कि संविधान ने अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान किए हैं। इसलिए, आरक्षित सीटों की संख्या और उनकी मूल भावना को कमजोर करने वाला कोई भी कदम संविधान की आत्मा के विरुद्ध होगा। उन्होंने इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा की जा सके।

आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर जनसंख्या का प्रभाव

सेमिनार में चर्चा की गई कि जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन की प्रक्रिया से आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। इस मुद्दे पर उपस्थित प्रतिनिधियों ने चिंता व्यक्त की कि यदि जनसंख्या को प्राथमिकता दी गई, तो इससे आदिवासी समुदायों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है।