झारखंड उच्च शिक्षा में नई रिस्ट्रक्चरिंग नीति पर चिंता
रांची : झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था में हाल ही में लागू की गई नई रिस्ट्रक्चरिंग नीति ने शिक्षा जगत में बहस छेड़ दी है। इस नई व्यवस्था के तहत शिक्षकों और सीटों का अनुपात निर्धारित किया गया है, जिससे रांची विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पीजी की पढ़ाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। यह स्थिति विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के छात्रों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
रांची विश्वविद्यालय में शिक्षक-सीट अनुपात
सरकार द्वारा निर्धारित नए ढांचे के अनुसार, रांची विश्वविद्यालय के पीजी विभागों में कुल 4240 सीटें निर्धारित की गई हैं। इन सीटों के लिए 130 सहायक प्राध्यापक, 59 एसोसिएट प्रोफेसर और 34 प्रोफेसर सहित कुल 223 शिक्षकों का प्रावधान किया गया है। इस अनुपात के अनुसार, हर 19 छात्रों के लिए एक शिक्षक उपलब्ध होगा, जो उच्च शिक्षा के लिए अपेक्षाकृत बेहतर माना जा रहा है। हालांकि, कई पीजी विभागों में सीटें पूरी नहीं भर पा रही हैं, जिसका मुख्य कारण नियमित सत्रों का न होना और समय पर परीक्षाओं एवं परिणामों का न आना है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय की स्थिति
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू) में स्थिति अलग है। यहां स्नातक के 3385 और स्नातकोत्तर के 1796 सीटों को मिलाकर कुल 5181 सीटें निर्धारित हैं। नए ढांचे के अंतर्गत यहां 204 शिक्षकों की नियुक्ति की गई है, जिसमें 126 सहायक प्राध्यापक, 52 एसोसिएट प्रोफेसर और 26 प्रोफेसर शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार, यहां एक शिक्षक पर औसतन 25 सीटों का भार होता है, जबकि वास्तविकता में एक शिक्षक पर लगभग 100 छात्रों का शैक्षणिक भार पड़ता है। यह अनुपात रांची विश्वविद्यालय के पीजी विभागों की तुलना में काफी अधिक है।
कॉलेजों में पीजी पाठ्यक्रमों का संकट
नई नीति का सबसे अधिक प्रभाव कॉलेजों में संचालित पीजी पाठ्यक्रमों पर पड़ सकता है। सरकार ने कॉलेजों में चल रहे पीजी कोर्सों की सीट क्षमता अभी तक निर्धारित नहीं की है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सीटों का निर्धारण नहीं किया गया, तो अगले शैक्षणिक सत्र से कॉलेजों में पीजी नामांकन बंद हो सकता है। ऐसी स्थिति में केवल रांची विश्वविद्यालय के पीजी विभागों में ही स्नातकोत्तर की पढ़ाई संभव होगी।
छात्रों की बढ़ती चिंताएँ
रांची विश्वविद्यालय के अधीन गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा और खूंटी के कई कॉलेजों में पीजी की पढ़ाई होती है। यदि इन कॉलेजों में पीजी नामांकन बंद होता है, तो छात्रों को रांची आना पड़ेगा। यह ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि उन्हें आवास, भोजन और परिवहन पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। ऐसे में कई छात्रों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
शिक्षा विशेषज्ञों की चिंताएँ
शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि उच्च शिक्षा को गांवों और छोटे शहरों तक पहुंचाने के लिए पिछले कई वर्षों से कॉलेजों में पीजी की पढ़ाई शुरू की गई थी। यदि इसे फिर से विश्वविद्यालयों तक सीमित किया गया, तो इससे उच्च शिक्षा का विकेंद्रीकरण प्रभावित होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को कॉलेजों में पीजी पाठ्यक्रमों की सीट क्षमता जल्द तय करनी चाहिए, ताकि छात्रों और अभिभावकों के बीच अनिश्चितता समाप्त हो सके।
छात्रों की मांगें
छात्र संगठनों और शिक्षकों का कहना है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले सभी जिलों के कॉलेजों की आवश्यकताओं और वहां पढ़ रहे विद्यार्थियों की संख्या का सही आकलन किया जाना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि यदि उच्च शिक्षा को सुलभ बनाने के बजाय विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित किया गया, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान ग्रामीण छात्रों को होगा।
