80 का दशक वो दौर था जब झारखंड अविभाजित बिहार का हिस्सा था. यह इलाका दक्षिण बिहार कहलाता था. बॉलीवुड में उन दिनों अमिताभ बच्चन ही नंबर वन हीरो थे लेकिन दूसरी तरफ मिथुन चक्रवर्ती इस इलाके में काफी लोकप्रिय थे. इसकी वजह यह थी कि यहां के लोग नृत्य और संगीत के काफी शौकीन हैं इसलिए उन्हें मिथुन की फिल्मों के धूम धड़ाके वाले गाने खूब पसंद आते थे. यह डिस्को डांस का जमाना था. मिथुन की डिस्को डांसर नाम की फिल्म सुपर हिट हुई थी. इसके गाने टाइटल सांग आई एम ए डिस्को डांसर, जिम्मी जिम्मी आजा, गोरों की ना कालों की काफी लोकप्रिय हुए थे. बप्पी लाहिड़ी के गाये हुए गानों याद आ रहा है तेरा प्यार और कोई यहां आहा नाचे नाचे को भी लोगों ने पसंद किया था.

2011 में रीलीज हुई विद्या बालन, नसीरुद्दीन शाह और तुषार कपूर की फिल्म द डर्टी पिक्चर सुपर हिट हुई थी. इस फिल्म के एक गीत ऊ ला ला ऊ ला ला तू है मेरी फैंटेसी ने गजब की धूम मचाई थी. यह गीत बप्पी लाहिड़ी ने ही गाया था. एक लंबे अर्से तक लगभग भूला दिये गये से बप्पी दा फिर से एक बार चर्चा में आ गये थे. इसके बाद इन्होंने गुंडे (13), बद्रीनाथ की दुल्हनिया (17)) शुभ मंगल ज्यादा सावधान तथा बागी – 3 (20) में भी म्यूजिक दिया.
हालांकि उन पर कई बार विदेशी धुनों को भी चुराने का आरोप लगा पर उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और अपनी धुन में आगे बढ़ते चले गये. बप्पी लाहिरी के दौर से ही हिंदी फिल्म संगीत में एक महत्वपूर्ण बदलाव ये आया की अब गीतों के बोल महत्वपूर्ण नहीं रह गये. म्यूजिक ज्यादा हावी होता चला गया. ऐसे गीत ज्यादा आने लगे जिन पर फास्ट डांस किया जा सके. ये गाने हिट भी होने लगे. मिथुन और जीतेंद्र की अधिकतर फिल्मों के गीतों का यही हाल था. बेमतलब के बोल वाले गाने भी चल जाते थे. इसका असर यह हुआ की गीतों में शब्दों का महत्व और भावनाओं को अच्छे अंदाज में व्यक्त करने का चलन लगभग खत्म सा हो गया. ये सिलसिला 1985 तक तो खूब जोर शोर से चला. 1988 में आयी कयामत से कयामत तक से एक बार फिर मधुर गीतों का दौर शुरू हुआ. 1990 के दशक में बप्पी दा फिल्मों से थोड़ा अलग होकर निजी एलबमों पर भी काम किया.
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