नीरा यादव ने सरकार को चुनौती दी, ओबीसी आरक्षण और बच्चों के कल्याण की मांग की।

by PragyaPragya
नीरा यादव

झारखंड विधानसभा बजट सत्र में नीरा यादव की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में विधायक नीरा यादव ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक तथा पिछड़ा वर्ग के कल्याण विभागों के बजट में कटौती के प्रस्ताव पर अपनी चिंताएँ व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सरकार ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का वादा किया था, जो अब तक केवल कागजों में ही रह गया है। नीरा यादव ने सरकार से इस मामले में तात्कालिक कार्रवाई की मांग की।

दिल्ली फोबिया और अनुभवी सलाह की जरूरत

नीरा यादव ने सत्ता में “दिल्ली फोबिया” की प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि सरकार को अनुभवी चिकित्सकों से सलाह लेने की आवश्यकता है। उन्होंने उल्लेख किया कि वृद्ध पेंशन और दिव्यांग पेंशन पहले 600 रुपये थी, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बढ़ाकर 1000 रुपये प्रति माह कर दिया था। अब समय आ गया है कि इसे फिर से बढ़ाया जाए।

ओबीसी आरक्षण पर गंभीर चिंता

उन्होंने साहेबगंज, गुमला, सिमडेगा और लोहरदगा जैसे जिलों में ओबीसी आरक्षण को शून्य तक घटाए जाने पर चिंता व्यक्त की। वे कहते हैं कि आउटसोर्सिंग में आरक्षण लागू करने की घोषणा का कोई वास्तविक लाभ दिखाई नहीं देता। इसके अलावा, ओबीसी, एसटी, और एससी छात्रों को जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने में अनेक परेशानियाँ आ रही हैं। उन्होंने स्थानीय स्तर पर प्रमाण पत्र बनाने के लिए शिविर लगाने का सुझाव दिया, ताकि छात्रों को कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़े।

कल्याणकारी योजनाओं की अनुपस्थिति

विधायक ने बजट में शून्य से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र किया, परन्तु इन योजनाओं के प्रभाव पर सवाल उठाया। उन्होंने आंगनबाड़ी केंद्रों की खराब स्थिति और बाल कुपोषण पर भी चिंता जाहिर की। कोडरमा के आदिवासी छात्रावास की जर्जर हालत और बासी भोजन परोसने की शिकायतों को भी रखा। इसके अलावा, जामताड़ा में 13 वर्षीय बच्ची की मृत्यु ने स्वास्थ्य व्यवस्था की चूक को उजागर किया।

सदन में हुई बहस

इस दौरान विधायक प्रदीप यादव ने मध्य में हस्तक्षेप किया, जिस पर विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें उचित समय पर बोलने के लिए कहा। इस पर सदन में कुछ समय के लिए हंगामा हुआ, और भाजपा के अन्य सदस्यों ने आपत्ति जताई। नीरा यादव ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नेता होना ही सबसे ज्ञानी होने का प्रमाण नहीं है, और आदिवासी हित में सरकार द्वारा ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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