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सिद्धार्थ मल्होत्रा: एक संघर्षशील सितारे की कहानी
मुंबई: सिद्धार्थ मल्होत्रा का जन्म 16 जनवरी 1985 को दिल्ली में हुआ। वे एक मिडिल क्लास परिवार से आते हैं, जहां उनके पिता मर्चेंट नेवी में थे और मां गृहिणी हैं। पढ़ाई में कुश रहने के बावजूद सिद्धार्थ का झुकाव हमेशा से अभिनय और मॉडलिंग की ओर रहा। उन्होंने दिल्ली के शहीद भगत सिंह कॉलेज में पढ़ाई करते समय मॉडलिंग करना शुरू किया और कम उम्र में ही यह तय कर लिया था कि उन्हें अपनी पहचान स्वयं बनानी है। इस सपने के साथ उन्होंने मुंबई की ओर कदम बढ़ाया, जहां उनका असली संघर्ष प्रारंभ हुआ।
शाहरुख खान के साथ अनुभव
सिद्धार्थ ने अभिनय की दुनिया में प्रवेश करने से पहले फिल्म सेट पर सहायक निर्देशक की भूमिका निभाई। उन्होंने शाहरुख खान की फिल्म “माई नेम इज खान” में सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया, जिसका निर्देशन करण जौहर ने किया था। इस अनुभव ने उन्हें फिल्म निर्माण की गहराई से समझने का अवसर दिया। करण जौहर ने उनकी पर्सनालिटी और स्क्रीन प्रेजेंस को पहचाना, जो उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
बॉलीवुड में डेब्यू
2012 में, सिद्धार्थ मल्होत्रा ने करण जौहर की फिल्म “स्टूडेंट ऑफ द ईयर” से बॉलीवुड में अपनी शुरुआत की। इस फिल्म में उनका مقابل वरुण धवन और आलिया भट्ट थे। पहली ही फिल्म से सिद्धार्थ ने युवाओं में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके शांत स्वभाव, हैंडसम लुक और स्टाइल को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट मेल डेब्यू का पुरस्कार भी मिला, जिससे वे रातों-रात स्टार बन गए।
विविध किरदारों की तलाश
डेब्यू के बाद, सिद्धार्थ ने केवल रोमांटिक हीरो के रूप में सीमित रहने का साहस नहीं किया। उन्होंने विभिन्न प्रकार के किरदार निभाने की कोशिश की। फिल्म “हंसी तो फंसी” में उनका सॉफ्ट किरदार दर्शकों को भाया, वहीं “एक विलेन” में उनका इंटेंस अवतार चर्चा का विषय बना। “कपूर एंड संस” में निभाई गई गंभीर और परिपक्व भूमिका की आलोचकों ने सराहना की। “बार बार देखो” जैसी फिल्मों में भी उन्होंने प्रयोग किए।
हालांकि, सिद्धार्थ का करियर हमेशा आसान नहीं रहा। “ब्रदर्स,” “अ जेंटलमैन,” “अय्यारी,” “जबरिया जोड़ी,” “थैंक गॉड,” और “योद्धा” जैसी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर विशेष सफलता नहीं पा सकीं। इतने वर्षों में उनकी गिनी चुनी ही फिल्में हिट रही और कोई भी ब्लॉकबस्टर साबित नहीं हो पाई। इसके बावजूद, सिद्धार्थ ने हार नहीं मानी और लगातार अपनी क्षमताओं को सुधारने में लगे रहे।
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