तृप्ति डिमरी का जन्मदिन: संघर्ष से सफलता तक का प्रेरणादायक सफर

by PragyaPragya
Triptii Dimri Birthday: लोगों के घर जाकर खाती थीं खाना, 20 घंटे करती थीं शूटिंग, आज मेकर्स की पहली पसंद कैसे बनीं तृप्ति डिमरी | Triptii Dimri Birthday Special Inspiring Journey From Struggles To Stardom After Animal

मुंबई: उत्तराखंड के गढ़वाल में जन्मी तृप्ति डिमरी आज 23 फरवरी 1994 को अपना जन्मदिन मना रही हैं। एक समय छोटे-छोटे रोल में नजर आने वाली यह अभिनेत्री आज हिंदी सिनेमा की प्रमुख सितारों में शुमार हो चुकी हैं। उनके पिता, दिनेश डिमरी, एयर इंडिया में काम कर चुके हैं, जिसके चलते परिवार को दिल्ली में बसना पड़ा। उनकी मां, मीनाक्षी डिमरी, ने परिवार में कला और संस्कृति का माहौल बनाए रखा जिससे तृप्ति को उनकी अभिनय यात्रा की प्रेरणा मिली।

तृप्ति के पिता रामलीला के कलाकार रह चुके हैं और हर साल दशहरा समारोह का आयोजन करते थे। बचपन से ही घर में सांस्कृतिक गतिविधियों का माहौल होने से तृप्ति को अभिनय की प्रेरणा मिली। वह दिल्ली के श्री अरबिंदो कॉलेज में पढ़ाई के दौरान समाजशास्त्र में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की, जब उनकी ग्लैमर वर्ल्ड की ओर बढ़ने की चाहत और मजबूत हुई।

संतूर विज्ञापन से फिल्मों की ओर यात्रा

मॉडलिंग में कदम रखने के बाद तृप्ति को एक एजेंसी के माध्यम से ऑडिशन का अवसर मिला। उन्होंने संतूर साबुन के विज्ञापन से अपने करियर की शुरुआत की, जिसने उन्हें पहचान दिलाई और इसके बाद फिल्म इंडस्ट्री की ओर अग्रसर हो गईं। उन्होंने अभिनय की बारीकियों को सीखा और छोटे अवसरों को भी गंभीरता से लिया, जो उनके करियर की नींव बनी।

श्रीदेवी की आखिरी फिल्म से मिली पहचान

तृप्ति ने अपने करियर की शुरुआत दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी की आखिरी फिल्म “मॉम” से की। इस फिल्म में उनका रोल छोटा था, लेकिन यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ। इसके बाद 2018 में फिल्म “पोस्टर बॉयज” से उन्होंने मुख्य अभिनेत्री के तौर पर डेब्यू किया, हालाँकि इस फिल्म के जरिए उन्हें वह बड़ी सफलता नहीं मिली जिसका उन्होंने सपना देखा था।

साल 2018 में आई फिल्म “लैल मजनू” उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इस फिल्म की शूटिंग कश्मीर की खूबसूरत और चुनौतीपूर्ण वादियों में हुई। तृप्ति ने एक इंटरव्यू में बताया कि शूटिंग के दौरान उन्हें रोज़ 20 घंटे तक काम करना पड़ता था, जिसका मौसम बेहद ठंडा और कठिन था। कई बार वह रो पड़ती थीं और सोचती थीं कि क्या वह सही रास्ते पर हैं। टीम स्थानीय लोगों के घरों से खाना खाती थी, जो उनके लिए एक नया और चुनौतीपूर्ण अनुभव था। लेकिन इसी फिल्म ने उनके अभिनय के प्रति दृढ़ता और मजबूत कर दी।

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