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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ट यात्रा की घोषणा
प्रयागराज। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 3 मई से गोरखपुर में ‘गविष्ट यात्रा’ का आरंभ करने का ऐलान किया है। यह यात्रा 81 दिनों तक चलेगी और 23 जुलाई को गोरखपुर में समाप्त होगी। इस यात्रा के दौरान नियुक्त टीमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न गांवों में जाकर लोगों को जागरूक करेंगी और सनातन धर्म एवं गौसंरक्षण से संबंधित मुद्दों पर संवाद करेंगी।
गांवों तक पहुंचने का उद्देश्य
स्वामी ने एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि इस यात्रा के माध्यम से राज्य के लगभग 1.08 लाख गांवों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने समर्थकों से आग्रह किया कि वे टीम बनाकर गांव-गांव जाकर वस्त्र प्रमाण के साथ सत्य को जनता तक पहुंचाएं।
अनुमति संबंधी मुद्दे
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दावा किया कि इस कार्यक्रम के लिए प्रशासनिक स्तर पर कई बाधाएं उत्पन्न की गईं। उनके अनुसार, पहले काशी में कार्यक्रम को रोकने का प्रयास किया गया, फिर लखनऊ में प्रवेश को लेकर आपत्ति उठाई गई, और अंततः देर रात 16 शर्तों के साथ अनुमति दी गई, जिनमें बाद में 10 अतिरिक्त शर्तें जोड़ी गईं।
शंकराचार्य पद का महत्व
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि शंकराचार्य पद सनातन धर्म में सर्वोच्च स्थान रखता है। उनका यह भी मत था कि यह व्यवस्था ज्ञान और परंपरा पर आधारित है, न कि भीड़तंत्र पर। स्वामी ने गौसंरक्षण और सनातन धर्म की रक्षा को समाज की जिम्मेदारी बताते हुए संत समाज से सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।
राजनीतिक उद्देश्य की स्पष्टता
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट किया कि उनका इरादा कोई राजनीतिक दल बनाना नहीं है। उन्होंने बताया कि संत समाज का उद्देश्य नागरिकों में यह सन्देश फैलाना है कि जो भी गौसंरक्षण और समाज के हित में कार्य करे, उसे समर्थन मिलना चाहिए।
साधु समाज की विकृतियों पर चर्चा
स्वामी ने साधु समाज में आई कुछ विकृतियों पर भी चर्चा करने की योजना बनाई है। इस संदर्भ में विभिन्न अखाड़ों को पत्र लिखकर उनकी भूमिका को स्पष्ट करने का आग्रह किया जाएगा। इसके अलावा, उन्होंने ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’ बनाने का भी विचार व्यक्त किया, जिसमें संन्यासी, बैरागी, उदासीन और गृहस्थ शामिल होंगे।
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