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टीपू सुल्तान पर छिड़ा विवाद: महाराष्ट्र की राजनीति में गरमी
मुंबई। 18वीं सदी के मैसूर शासक टीपू सुल्तान के संदर्भ में महाराष्ट्र की राजनीति में ताजा विवाद ने तूल पकड़ लिया है। इस बहस में इतिहास, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न पहलुओं पर नेताओं के बीच तीखे बहस-मुबाहिसे देखने को मिल रहे हैं।
विवाद की शुरुआत
यह विवाद तब शुरू हुआ जब महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने टीपू सुल्तान की तुलना मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज से की। इस टिप्पणी पर सत्तारूढ़ दल ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे ऐतिहासिक दृष्टि से गलत बताया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि ऐसी तुलना अस्वीकार्य है और इस पर स्पष्टता जरूरी है।
ओवैसी का बचाव और ऐतिहासिक संदर्भ
इस बीच, असदुद्दीन ओवैसी ने टीपू सुल्तान का बचाव करते हुए कहा कि वे अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले शासकों में महत्वपूर्ण थे। उन्होंने कहा कि उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में भी स्मरण किया जाना चाहिए। ओवैसी ने यह भी बताया कि कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों में टीपू की अंगूठी पर “राम” नाम का उल्लेख मिलता है, जो सांस्कृतिक समावेश का प्रतीक है।
गांधी और कलाम का संदर्भ
ओवैसी ने पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी आत्मकथा “विंग्स ऑफ फायर” में टीपू सुल्तान के प्रयोगों की सराहना की है। इसके अलावा, उन्होंने महात्मा गांधी के लेखों का भी जिक्र किया, जिसमें टीपू को धार्मिक सहिष्णुता का समर्थक कहा गया है।
AIMIM बनाम भाजपा-कांग्रेस की बयानबाजी
ओवैसी की पार्टी AIMIM ने आरोप लगाया कि इतिहास को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की जा रही है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों का मानना है कि टीपू सुल्तान के मूल्यांकन को संतुलित ऐतिहासिक संदर्भ में किया जाना चाहिए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, जिससे यह विवाद और अधिक राजनीतिक रंग ले रहा है।
इतिहास बनाम राजनीति
इतिहासकारों का कहना है कि टीपू सुल्तान एक जटिल ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे। वे एक ओर ब्रिटिश शक्ति के खिलाफ लड़े, जबकि दूसरी ओर उनके शासन के विभिन्न पहलुओं पर भिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं। इस बहुआयामी विरासत के चलते उनका नाम समय-समय पर राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन जाता है।
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