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📌 गांडीव लाइव डेस्क:
माँ की अनंत प्रतीक्षा: रिनपास की एक दर्दनाक कहानी
एक सर्द सुबह, वर्ष 1997 में, जब एक पत्नी और माँ को उसके पति ने रिनपास में छोड़ दिया, तब उसका जीवन एक अनिश्चितता में परिवर्तित हो गया। पति ने उसे आश्वासन देते हुए कहा था, “कुछ ही दिनों में तुम स्वस्थ होकर घर आओगी,” लेकिन उसके बाद वह कभी लौटकर नहीं आया। समय बीत गया, दवाइयां बदलती रहीं, लेकिन उसकी आँखों में वही उम्मीद बनी रही।
लौटने की आस 🌅
सोचिए, एक दिन उसका बेटा उसके दरवाजे पर खड़ा था, जवान और शादीशुदा। माँ की आँखों में आँसू नहीं थे, बल्कि एक हल्की मुस्कान थी। उनके बीच कई यादें साझा हुईं; बचपन की शरारतें और माँ के हाथ का खाना। बेटे ने कहा, “कल मैं आऊँगा, तुम्हें घर ले जाऊँगा,” लेकिन उस रात माँ ने नींद नहीं ली।
निराशा का साया 🌑
सुबह होते ही माँ ने अपने सामान को तैयार किया और दरवाजे की ओर देखकर बैठ गई। हर आहट पर उसका दिल धड़कता रहा। लेकिन दिन ढलते-ढलते सारा उत्साह गायब हो गया। बेटा नहीं आया। उसके मन में केवल एक ही शब्द रह गया—”कल… वह कल आएगा।”
अंतिम क्षण
कई वर्षों बाद, एक सुबह उसकी साँसें थम गईं, उसी कुर्सी पर जहां उसने अपने बेटे का इंतज़ार किया था। मृत्यु की सूचना परिवार को दी गई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। फिर डालसा की टीम वहाँ आई और अंततः उसके चचेरे भाई आए, जिन्होंने शव को उठाया। हरमू मुक्तिधाम में उसका अंतिम संस्कार किया गया। धुएँ में, वह शायद आखिरी बार अपने बेटे की प्रतीक्षा कर रही थी।
अंत नहीं, एक शुरुआत
यह कहानी खत्म नहीं होती। आज भी कई माताएँ ऐसी हैं, जिनकी कहानियाँ अस्पतालों या घरों के कोनों में छिपी हैं, जहाँ उनका “कल” कभी नहीं आता। उन माँओं का इंतज़ार निरंतर जारी है, और यह प्रतीक्षा कभी खत्म नहीं होगी।
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