धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’: इमोशंस और जोश से भरी, अगास्त्य का प्रदर्शन कैसा

Ikkis Review: शहादत, इमोशंस और ढेर सारे जोश से भरी है धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म 'इक्कीस', कैसा है अमिताभ बच्चन के पोते का काम? | Ikkis Movie Review Agastya Nanda Shines Dharmendra last film Impresses

मुंबई: श्रीराम राघवन द्वारा निर्देशित फिल्म **इक्कीस** अब सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है। यह फिल्म भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट **अरुण खेत्रपाल** के जीवन पर आधारित है। फिल्म में अरुण खेत्रपाल का किरदार **अगस्त्य नंदा** ने निभाया है, जबकि उनके पिता **ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल** के पात्र में **धर्मेंद्र** नजर आते हैं। महत्वपूर्ण भूमिका में **जयदीप अलहावत** भी हैं।

<p>**इक्कीस** अरुण खेत्रपाल के जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को उजागर करती है। यह फिल्म उनके बचपन, परिवार, पहले प्यार, एनडीए के दिनों और पूना हॉर्स के साथ सैन्य सफर को दर्शाते हुए, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध तक पहुँचती है। विशेष रूप से, बसंतर की लड़ाई को फिल्म का भावनात्मक केन्द्र बनाया गया है।</p>

<h3><strong>इक्कीस की कहानी</strong></h3>
<p>कहानी की शुरुआत 2001 से होती है, जब ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल लाहौर में अपने कॉलेज के पुराने दोस्तों से मिलने जाते हैं। यह यात्रा उन्हें अपने अतीत की याद दिलाती है। बंटवारे से पहले का समय, पुराना घर और वह स्थान जहां उनके बेटे ने देश की रक्षा में बलिदान दिया। वह तीन दिन **नसीर** के घर रुकते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि नसीर उनके अतीत से जुड़ी एक गंभीर सच्चाई छुपाए हुए है।</p>

<h3><strong>इक्कीस का डायरेक्शन</strong></h3>
<p>**इक्कीस** की सबसे बड़ी खूबी इसका निर्देशन है। श्रीराम राघवन ने इस फिल्म को नॉन-लीनियर ढंग से पेश किया है। अतीत और वर्तमान के बीच लगातार बदलाव कहानी को एक विशेष रंग प्रदान करता है। यह तरीका दर्शकों से पूरा ध्यान मांगता है और कई बार उन्हें चौंका देता है। कुछ सीन इतने प्रभावी हैं कि टाइमलाइन का बदलाव विचार करने के लिए मजबूर कर देता है।</p>

<p>धर्मेंद्र से जुड़े दृश्य फिल्म की आत्मा हैं। उनकी अदाकारी शांत रहती है, लेकिन भीतर की गहरी पीड़ा का अहसास कराती है। संवादों की कमी के बावजूद, वह दुख और गर्व का संतुलन रखते हैं। वहीं, अगस्त्य नंदा के युद्ध दृश्य अत्यंत दमदार हैं। उनकी ट्रेनिंग और युद्ध के क्षण दिखाते हैं कि एक सैनिक बनने के लिए सिर्फ हिम्मत नहीं, बल्कि अनुशासन और बलिदान भी जरूरी है। फिल्म का विजुअल टोन संतुलित रहता है, जबकि रंगों का चयन कहानी के मूड के अनुरूप है।</p>

<h3><strong>कहां कमजोर पड़ती है फिल्म</strong></h3>
<p>फिल्म के पहले हिस्से में कुछ अस्थिरता दिखाई देती है। जब दर्शक किसी दौर में डूब जाता है, तो एडिटिंग उसे अचानक दूसरे समय में ले जाती है। यह बार-बार का बदलाव कुछ स्थानों पर ध्यान भटकाता है। इसके अलावा, रोमांटिक ट्रैक मुख्य कहानी की तुलना में कमजोर लगता है और कई बार गैर-जरूरी भी महसूस होता है।</p>

<p>अगस्त्य नंदा ने अरुण खेत्रपाल के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। वह एक युवा सैनिक की ऊर्जा और संकल्प को अच्छे से दर्शाते हैं। युद्ध के दृश्यों में उनकी बॉडी लैंग्वेज और आंखों की गंभीरता विद्यमान है। धर्मेंद्र फिल्म के भावनात्मक आधार हैं। उनका प्रदर्शन साधारण, लेकिन प्रभावशाली है, जहां वह यादों, दुख और गर्व को संतुलन में रखते हैं। जयदीप अहलावत ने भी अपने किरदार में गहराई और सच्चाई को भलीभांति पेश किया है।</p>

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